AGOSH 1

D.r HIMANSHU SHARMA

31 Posts

490 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12134 postid : 68

उमरिया ढल गयी रे

Posted On: 29 Oct, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पिया ढूंडन को चली, उमरिया ढल गयी रे।
कल -कल करती रह गयी ,समय अब टल गया रे ।।

रहे नहीं कजरारे नैना ,रातो को ना आवे चैना ।
अब ना रही कोयल सी बोली ,बातें भी लगती है गोली ।।
ग़जगामनी चाल रही ना ,चिकनी चुपड़ी खाल रही ना ।
मै तो गयी चिन्ता मे सूख ,अब मिट गयी मेरी भूख ।।

पिया ढूंडन को चली, उमरिया ढल गयी रे।
कल -कल करती रह गयी ,समय अब टल गया रे ।।

लाल रंग मेरा पीला पड़ गया ,चंद्रमुखी अब तेज रहा ना ।
काले केश सफेद हो चले ,कमरिया अब ना लचकाये रे ।।
पहले जैसी अदा रही ना ,मर्दों को लुभाने की बात रही ना ।
सब बाते अब नश्बर हो गयी ,रंगरलियो मे, मै तो रह गयी ।।

पिया ढूंडन को चली, उमरिया ढल गयी रे।
कल -कल करती रह गयी ,समय अब टल गया रे ।।

पिया ढूंडन की सोच रही ना ,कीचड़ धूल मे मै तो रिल गयी ।
ब्रद्ध भई अब मेरी काया ,धुमिल हो गयी घर की माया ।।
कौन बने अब मेरा सहारा ,नजर नहीं आता उजियारा ।
समय गया अब लौट ना आवे ,अपनी भूल को मै ही सहूँ रे ।।

पिया ढूंडन को चली, उमरिया ढल गयी रे।
कल -कल करती रह गयी ,समय अब टल गया रे ।।
लेखक डॉoहिमांशुशर्मा(आगोश )

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (13 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

15 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
November 1, 2012

काले केश सफेद हो चले ,कमरिया अब ना लचकाये रे ।। पहले जैसी अदा रही ना ,मर्दों को लुभाने की बात रही ना । सब बाते अब नश्बर हो गयी ,रंगरलियो मे, मै तो रह गयी ।। पिया ढूंडन को चली, उमरिया ढल गयी रे। बहुत खूब

bhanuprakashsharma के द्वारा
November 1, 2012

सुंदर, भावपूर्ण अभिव्यक्ति, जीवन की सच्चाई। उमदा रचना। बधाई। 

deepasingh के द्वारा
October 30, 2012

वन्दे मातरम आदरणीय अनुराग जी. उमरिया ढल गई रे आपकी सुन्दर शब्दों से बनी सुन्दर कविता के लिए बधाई.

akraktale के द्वारा
October 30, 2012

आदरणीय अनुराग जी                       सादर, बस एक ही पंक्ति कहूँगा अब पछताय क्या होत है चिड़िया चुग गई जब खेत.  सुन्दर भावनापूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें. आद. शशी जी कि बात से सहमति है. क्षमा सहित पिया ढूंडन को चली, उमरिया ढल गयी रे। कल -कल करती रह गयी ,समय अब टल गया रे ।। कल-कल करती रह गयी, बेला अब टल गयी रे.  कैसा रहेगा.   

shashibhushan1959 के द्वारा
October 29, 2012

आदरणीय अनुराग जी, सादर ! रचना के भाव बहुत अच्छे, शब्द का चुनाव भी बेहतर, पर पंक्तियों में कसाव नहीं मिल रहा ! प्रवाह नहीं मिल रहा ! टाइपिंग की अशुद्धियाँ भी बहुत हैं ! इनसब पर थोड़ा और ध्यान देने की आवश्यकता है ! (क्षमाप्रार्थना के साथ) सादर !

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 30, 2012

    भूषण गुरु देव प्रणाम , आप का आभारी ,आप बहुत ही अच्छी टिप्पणी करते हैं ,मैने अपने दोनों ब्लॉग पर देखा है ,(जीवन एक महादर्शन ,आगोश ) आप की टिप्पणी से एक गुरु का आशिर्बाद और एक भाई जैसा प्यार झलकता है ,आपका हमेशा आभारी ,,,डॉ हिमांशु शर्मा

Santlal Karun के द्वारा
October 29, 2012

श्रेष्ठ संवेदनात्मक प्रस्तुति; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “रहे नहीं कजरारे नैना ,रातो को ना आवे चैना । अब ना रही कोयल सी बोली ,बातें भी लगती है गोली ।। ग़जगामनी चाल रही ना ,चिकनी चुपड़ी खाल रही ना । मै तो गयी चिन्ता मे सूख ,अब मिट गयी मेरी भूख ।।”

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 30, 2012

    कोटि -कोटि प्रणाम ,आभारी हूँ आपका ,,,,,,,,

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 29, 2012

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन आदरणीय अनुराग सर जी, सादर अभिवादन . बढती उम्र घटती जवानी कम होता पोखर में पानी करले श्रृंगार जीवन है फानी पिया घर जाना है बधाई.

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 29, 2012

    प्रदीप जी कोटि -कोटि प्रणाम ,आभारी हूँ आपका मेरे दोनों ब्लॉग पर सर्व प्रथम टिप्पणी देने का व आपके स्नेह का आभारी डॉ हिमांशु शर्मा (आगोश ),,,,,,,,,,,,


topic of the week



latest from jagran