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D.r HIMANSHU SHARMA

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'गजल' जिन्दगी'

Posted On: 25 Oct, 2012 में

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‘जिन्दगी की राहे,
फिसलन भरी रही।
कदम डगमगाये,
अब मंजिल दूर नहीं।
ढूँढते-ढूँढते दूर,
चले आये राही ।
जिनकी तलाश थी,
वह स्वंयम आ मिली ।
अधर मौन थे,
आंखो से आंख मिली
बेबसी के द्वार पर
खिल गयी एक कली ।
महक उठी जिन्दगी,
उड़कर हवा चली
कैसे कहूं बात उस रात की ,
खिड़की खुली रही।
जिन्दगी जीने को थी,
पर सांस निकल गयी
कारवा संजाये थे
बहुत पर अपनी एक ना चली ।
तुझे देखते रहे,
चलते -चलते लीक पर ।
जहां – जहां तु चली
हाथ मलते रहे खुवाव
जब रूठ कर हमसे तु चली’ ।

हिंदी लेखक डॉo .हिमांशु शर्मा(आगोश )

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
November 1, 2012

आदरणीय अनुराग जी, सादर ! “”चलते -चलते लीक पर । जहां – जहां तू चली हाथ मलते रहे ख्वाब जब रूठ कर हमसे तू चली’ ।”" जिंदगी को समझने का प्रयास ! जिंदगी—- सरस भी है – नीरस भी है, सदय भी है – निर्दय भी है, बावफा भी है – बेवफा भी है ! बेहतर ! हार्दिक बधाई !

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    November 1, 2012

    भूषण जी आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर मन प्रफुलित होने लगता है ,,मुझे बड़ी ख़ुशी हुई की आप मेरे दोनों ब्लोगों पर (अनुराग ,आगोश )पर आभार प्रकट करते है आपका आभारी डॉ हिमांशु शर्मा (आगोश )

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 29, 2012

महक उठी जिन्दगी, उड़कर हवा चली कैसे कहूं बात उस रात की , खिड़की खुली रही। जिन्दगी जीने को थी, पर सांस निकल गयी बहुत सुन्दर भाव , बधाई सर जी, सादर अभिवादन के साथ

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 29, 2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला –

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 29, 2012

    मदन मोहन जी बहुत आभारी हूँ आपका

bhanuprakashsharma के द्वारा
October 27, 2012

सुंदर अभिव्यक्ति।  आभार। 

akraktale के द्वारा
October 25, 2012

कैसे कहूं बात उस रात की , खिड़की खुली रही। जिन्दगी जीने को थी, पर सांस निकल गयी वाह! सुन्दर रचना. बधाई स्वीकारें आदरणीय अनुराग जी.

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 26, 2012

    भाई साहब , बारम्बार आभारी हूँ आपका ,

Santlal Karun के द्वारा
October 25, 2012

अच्छी ग़ज़ल -सी नवीन ग़ज़ल; साधुवाद एवं सदभावनाएँ !


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