AGOSH 1

D.r HIMANSHU SHARMA

31 Posts

490 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12134 postid : 65

अनौखा स्नेह'

Posted On: 15 Oct, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

‘ग्रामीण आँचल में एक ऐसा परिवार जिसमें माँ-बाप के अलावा दो पुत्र आनंद और अरविन्द नाम एक राशी के और काम दोनों के अलग-अलग । आनंद का विवाह शहरी लड़की से होता है और अरविंद का ग्रामीण लड़की से होता है । आनंद की पत्नी शहरी होने के कारण शहर की और रुख कर लेती है तथा गाँव को बैकवर्ड बताकर शहर में वापस पहुंच जाती है और साथ में अपने पतिदेव को भी साथ ले जाती है । स्वयं पढ़ी-लिखी होने के कारण शहर में व्यवस्थित होने के पशचात आनंद को भी रोजगार दिला देती है । कुछ दिन समय निरंतर यूँ ही बीतता गया और फिर…….

दो-चार वर्ष व्यतीत हो जाने पर आनंद का गाँव से लगाव जाग्रत होता है जो केवल गाँव में शेखी मारना और सभी को भ्रमित करना कि ” मैं शहर में बड़ा आदमी बन गया हूँ ” इस झूठ से सबसे ज्यादा आकर्षित आनंद की माता ‘ विजय ‘ होती और शेखी का दौर घुमने लगता है, वे सदैव अपने बड़े पुत्र के मोह में छोटे पुत्र की अवहेलना और तानों से छोटे पुत्र को हमेशा परेशान रखती, इनकी देखादेखी राधेलाल, आनंद के पिता अपनी पत्नी के कहे अनुसार चलते और आनंद की सराहना करते। समय बीतता गया और विजय अपने लाडले पुत्र को शहर में रहने के कारण बड़ा आदमी समझकर संयोगवश, उसको घर से दाल, अनाज यहाँ तक की पैसे भी भेजती रहती थी, जिससे उसको सहारा मिल सके । माँ और पुत्र की काफी रंग-भंग मिलती थी । मगर इस बात पर छोटे बेटे की पत्नी नीरज काफी ध्यान देती थी कि उसका पति दिन-रात खेतों पर कार्य करता है और सारे माल को (दाल, अनाज, रुपया)को दूसरा भाई खाये ? घर की खेती व लगान पर ली गयी जमीन में मेहनत नीरज के पति की खाये कोई और नीरज के बर्दास्त के बाहर हो चुका था । क्योंकि सारे दिन-रात करने के बाद दो रूपये भी नहीं हैं ।

अब एक ऐसा दृश्य सामने आता है की अरविन्द अपने बच्चों को स्वयं के विवेक से कुछ भी लाने में असमर्थ रहता वो तो बेचारा इतना काम-धाम करने पर भी माँ-बाप के उपर आश्रित रहता इसी कुरेदना से उसके मस्तिस्क में परेशानीयों ने जन्म लेना शुरु कर दिया, एक दिन अरविन्द बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा । उसका जबड़ा बंद और घबराने की स्थति बन गई तो उसकी परेशानी को सुनकर मैं भी अरविन्द के घर जा पहुंचा क्योकिं वे हमारे कुनबे का एक सदस्य है । मैंने उसको अच्छे डॉक्टर के यहाँ के जाने की इच्छा जाहिर की तो सब परिजन मान गए और डॉक्टर के यहाँ अरविन्द को ले पहुचें । डॉक्टर ने अरविन्द का चेकअप किया और कुछ दवाईयां उसे खिलाई जिससे अरविन्द को काफी फायदा मिला । सयोंगवश मैंने डॉक्टर से पूछा कि डॉक्टर साहब इसे क्या बीमारी हो गई है, जवाब मिला इसे टेंशन है मैंने कहा डॉक्टर साहब इसे टेंशन की दावा दो अन्यथा इसकी पेंशन होने में जरा सी भी देर न लगेगी आखिर रिश्तों में भाई था और दो कन्याओं का बाप मैने उससे अकेले में पूछा की भाई तुझे क्या परेशानी है जो तेरी इतनी भयानक स्थति गई, पहले तो चुप रहा मगर कुछ पल बाद वह बोला क्या पूछ रहे हो मैं अचंभित सा हो गया कि मैने ऐसा क्या पूछ लिया जो यह नाराज हो गया ।

फिर उसने प्रेमपूर्वक बताया कि भाई मेरी टेंशन की स्थति क्यों बनी जिससे मैं बीमार हुआ, मैं तुम्हें बताता हूँ बोला कि मैं दिन भर खेतों पर काम करता हूँ और जो फसल से रूपये आते है उन्हें उन्हें पापा-मम्मी रख लेते हैं, अगर मैं कुछ माँगता हूँ तो यह कहकर टाल देते हैं कि तेरे बच्चों का खर्च तो हम ही चला रहे हैं अब तुम यह बताओ क्या रोटी-पानी ही खर्चा होता है, कम से कम एक मजदूर अब दो या तीन सौ की दिहाड़ी लेकर घर लोटता है, मगर उस रूपये को मेरे माता-पिता, आनंद को प्यार से दे देते हैं । चलो खर्चा भी छोड़ो एक बात सुनो अगर मेरी बीबी के पास अंग वस्त्र ना हो त्तो क्या मै पापा से कहूँ की लाओ पैसा या मेरी पत्नी के लिए एक चोली, कच्छा, बिंदी व पाउडर ले आना । मैने कहा बस चुप हो जा, मै बात करूँगा ।

मैने विजय जो हमारी चाची है उनसे कहा कि चाची इस अरविन्द को कम से कम महीने में दो तीन हज़ार रूपये दे दिया करो जिससे यह अपने बीबी बच्चों का खर्च चला लिया करे या जरुरत का समान ले लिया करे, उस पर चाची ने कहा देख सब समान व खाना पीना इसका हम करते है तो फिर इसे रूपये की क्या जरूरत, मैने कहा ठीक है पर ये तो बतायो की इसका या इसकी बीबी का कभी जलेबी खाने को मन करे तो क्या करोगी बोली मैं तेरे चाचा से मंगवा दूंगी मैने कहा बहुत बढ़िया यह तो बहुत अच्छी बात है जो आप सामान मंगवा देती हो, तो इसकी बहु पर ‘चोली-कछा’ नही है, उन्हें भी चाचा से मंगवा देना यह सुनकर चाची शर्मसार होकर चुप बैठ गयी निगाहें नीचे हो गयी मैंने कहा चाची प्रत्येक इंसान की कुछ ऐसी जरुरत भी होती है जिन्हें वह स्वयम ही पूरा कर सकता है माँ-बाप सा कोई नही । फिर भी चाची ने रुपया देने से चुप्पी साध ली मैंने कहा अच्छा प्यार है अपने बच्चों से एक बच्चा – एक रुपये को तरसे और दूसरा आनन्द जो अपने बच्चों के अलावा कुछ भी घर के लिये नही करता फिर भी उसे रुपया दिया जाता है और जो सारा काम व तुम्हारी सेवा करे उसको दुतकार वाह क्या बात है ।

देखो गाव में कैसा चलन है एक परिवार का बच्चा जो माँ-बाप को छोड़कर बाहर रहता है जिसकी जिम्दारी परिवार से हट जाती है फिर भी उससे कैसा स्नेह ?

आनंद के पास जब भी पैसों या अनाज की किल्लत होती है तो वह गाँव का रुख करता और साथ में अपनी पत्न्नी के उतरे वस्त्र व अपनी पुरानी कमीज साथ में लाता है तो चाचा- चाची खुश हो जाते है, और बदले में उसको घी भरी रोटी खिलाते है और जो घी पशुओ की सेवा करके अरविंद की बहु इक्कठा करती है वो आनद को दे दीया जाता है वाह क्या बात है ऐसे अभागे माँ-बापों की जो अपनी सेवा-भाव करने वालो को घी-दूध देने की जगह दुतकार और जो मौज उड़ा रहे है शहरों में रहकर उनको स्नेहवश घी-दूध । यह सच है कि जो चीज पास होती है उसकी कदर नहीं होती और जो पल भर आकर मिलते है उनको मान सम्मान सराहना ज्यादा मिलती है । दूर के ढोल सुहावने ।

ऐसे माँ-बापों से मेरा नम्र निवेदन यही रहेगा कि जो पास है उससे ही आस रखनी चाहिये।जो दूर है उनसे स्नेह क्यों जो तुम्हारी सेवा भाव से दूर रहता है और पल भर के लिए स्नेह दिखाता है, तो माँ-बाप को भी ऐसी औलाद पर खाली पल दो पल का प्यार लुटाना चाहिए, जैसा औलाद लुटाने आती है। अगर उनसे कहा जाय कि तुम माँ बापों को अपने साथ रखो तो उनका जवाब नकारात्मक ही होगा। क्योकि उनके स्वंयम के खर्च भी नहीं चल पाते, तो वे माँ बाप का खर्च क्या चलायेंगे।

‘फिर मै एक दिन अरविन्द के घर गया और अरविन्द से परामर्श किया कि भाई तू भी कोई ना कोई रोजगार ढूंड ले जिससे तेरे अपने बच्चो का सही लालन-पालन हो सके। कब तक माँ-बाप की पूंछ पकडेगा, अरविन्द बात मान गया और नौकरी ढूंड कर अपने बच्चों का सही लालन पोषण कर रहा है।

मगर चाचा- चाची को अपनी गलती का अहसास पल-पल परेशान करता है। और अरविन्द के काम व सेवा भाव की याद करके बहुत पश्चाताप करते है ।

लेखक डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश)

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (14 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

26 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 25, 2012

aadarniya अनुराग जी, सादर अभिवादन. वास्तविक चित्रण. सही सलाह. बधाई.

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 25, 2012

    प्रदीप जी आभार के लिये आभारी हूँ साहब ,,

manoranjanthakur के द्वारा
October 23, 2012

मेरा भी नमन … बहुत सुंदर पोस्ट … बधाई

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 25, 2012

    मनोज जी आभार के लिये आभारी हूँ साहब ,,

yogi sarswat के द्वारा
October 18, 2012

ऐसे माँ-बापों से मेरा नम्र निवेदन यही रहेगा कि जो पास है उससे ही आस रखनी चाहिये।जो दूर है उनसे स्नेह क्यों जो तुम्हारी सेवा भाव से दूर रहता है और पल भर के लिए स्नेह दिखाता है, तो माँ-बाप को भी ऐसी औलाद पर खाली पल दो पल का प्यार लुटाना चाहिए, जैसा औलाद लुटाने आती है। अगर उनसे कहा जाय कि तुम माँ बापों को अपने साथ रखो तो उनका जवाब नकारात्मक ही होगा। क्योकि उनके स्वंयम के खर्च भी नहीं चल पाते, तो वे माँ बाप का खर्च क्या चलायेंगे। सुन्दर , व्यवहारिक और सामाजिक पोस्ट ! यही होता है समाज में !

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 19, 2012

    आभारी हूँ मै आपका सब को मै बताऊंगा ,आशीर्बाद मिलता रहे आपका इतना मै चाहूँगा ,,,

अजय यादव के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय श्रीमान जी,सादर अभिवादन | आपकी लेखनी ने एक चलचित्र सा शमा बांधा|बधाई आपका अजय

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 18, 2012

    बारम्बार धन्यबाद जी ,,,,,,,,,,,,,,,,

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 17, 2012

बेहतरीन शब्द आकृति

akraktale के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय अनुराग जी                        सादर,दूर के ढोल सुहावने, बस यही बात है. अक्सर देखी जाने वाली परिस्थिति पर आपने बहुत अच्छे से लिखा है. माता पिता द्वारा यह जानबूझकर ना होकर अज्ञानतावश  ऐसी परिस्थितियों का निर्माण हो जाता है. सुन्दर कथा पर बधाई स्वीकार करें.

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 18, 2012

    भाई साहब को बारम्बार धन्यबाद जी

shashibhushan1959 के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय अनुराग जी, सादर ! कथा का उद्देश्य बहुत अच्छा है ! पर रचना उतनी सशक्त नहीं बन पायी है, जो इस कथावस्तु पर बन सकती थी ! कई जगह वाक्यों में सामंजस्य नहीं है ! लगता है बहुत जल्दीबाजी में लिखी गई है और उसे दोहराया भी नहीं गया है ! (क्षमाप्रार्थना के साथ) सादर !

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 18, 2012

    भाई साहब को बारम्बार धन्यबाद,,,उचित मार्गदर्शन के लिये ,,आभारी

bhanuprakashsharma के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय आगोश जी, आज समाज की हकीकत से आपने रूबरू करा दिया। सच ही तो है, दूर के ढोल हमेशा  सुहावने लगते हैं। पास वाले की कद्र नहीं होती। सुंदर आलेख व एक बेहतर संदेश, बधाई स्वीकारें। 

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 16, 2012

    बारम्बार धन्यबाद भाई साहब ,आभारी

mataprasad के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय अनुराग JI , सादर नमस्कार आप ने जो लिखा है वो एक दम सच है लोग उसकी कदर नही करते जो उनके पास होते है और सच के साथी होते है किन्तु जो दूर होते है और थोडा क्षणिक दिखावा कर देते है वाही उनके लिए प्यारे बन जाते है!!

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 16, 2012

    mata parsad ji barambar dhnyabadh.yh kahani un parivaro ki hai jinkai bacchai akanki parivar mai rahatai hai.

sudhajaiswal के द्वारा
October 15, 2012

आदरणीय अनुराग जी, आपने इस कहानी के माध्यम से ऐसी कडवी सच्चाई सामने राखी है जिसे समाज में लोग मानते ही नहीं, ऐसे माँ बाप भी हैं जो अपने ही बच्चों में सौतेलों सा भेद-भाव करते हैं | समाज की इस कड़वी हकीकत को सामने लाने के लिए आपको धन्यवाद और बहुत-बहुत बधाई |

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 16, 2012

    bahan sudha ji barambar dhnyabadh.yh un parivaro ka kadva sach hai jinkai bacchai akanki parivar mai rhtai hai aur ma bap unkai barai mai jhuti asha banaya rhatai hai

ashishgonda के द्वारा
October 15, 2012

आदरणीय! सादर, बहुत खूबसूरत प्रस्तुति, प्रेरणा देती कहानी के लिए आभार……

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 15, 2012

आदरणीय अनुराग सर , नमस्कार बहुत ही अच्छी कहानी / कहानी कहिये ये सच्चाई … बहुत सारे परिवारों में ये मुर्खता पूर्ण वयवहार होता रहता है … जिसका अंत कभी भी सुखद नहीं होता …. बधाई आपको

nishamittal के द्वारा
October 15, 2012

अनुराग जी आपकी प्रस्तुत समस्या कुछ परिवारों की समस्या हो सकती है,परन्तु कर्तव्यों के साथ अधिकारों को समाविष्ट कर प्रेम से ऐसे ही कुछ परामर्शदाताओं के सहयोग से समस्या को द्सुल्झाया जा सकता है

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    October 15, 2012

    nisha ji prtham tippani kai liyai abhari hu , sahyogh kai liya dhnaybadh .


topic of the week



latest from jagran