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D.r HIMANSHU SHARMA

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'ब्राह्मण देवता'

Posted On: 21 Aug, 2012 Others में

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ब्राह्मण गुणों की खान है, इनसे कोई दगा करे ना।
ब्राह्मण का वेश धर, लोग अपने को छिपाय रहे।
निजी जाति कर्म बदल, आदि गौड़ बताय रहे।
ब्राह्मण स्वर्ग का मूल है, इनकी सेबा से ध्यान हटे ना।

-(1)

माथे पर लगाई खोड, लोग कहै हम आदि गौड़।
गले में जनेऊ पहने, भीख मांगे ठोर-ठोर ।
घंट माल धारण करें, पोथी लें बगल दबाय ।
ये अजब निराले स्वांग है, करनी के फल मिटे ना।

-(2)

ब्राह्मण रूप धर इंद्र ने, कर्ण से मांग लिये पाँच बान।
ब्राह्मण रूप धर हनुमान ने, राम से लिया भेद जान ।
ब्राह्मण रूप धर सागर ने, राम से लिया अभय दान ।
ब्राह्मण वेद शास्त्रों का मान है, इनकी सेवा से धर्म घटे ना।

(3)

ब्राह्मण की महिमा देखो, परशुराम को ब्रह्म मान रहे।
जिन्दों की बात क्या, मरे हुये मान रहे।
जब दरिद्रता घेरे आन, कथा होम गायत्री करवाय रहे।
जब तक धरन आकाश है, ब्राह्मण की महिमा घटे ना।

(4)

लेखक डॉo हिमांशु शर्मा(आगोश)

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahulpriyadarshi के द्वारा
August 22, 2012

किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल, सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल। ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है, दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है। क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग, सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग।

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    August 23, 2012

    बहुत ही अच्छा कहा आपने, धन्यबाद जी ,

    jlsingh के द्वारा
    August 26, 2012

    आदरणीय राहुल जी, नमस्कार! आपकी प्रस्तुत कविता मैंने भी कहीं पढ़ी थी – सटीक!

dineshaastik के द्वारा
August 22, 2012

आदरणीय अनुराग जी, सनातन धर्म का मूल यही है कि व्यक्ति जन्म से न तो ब्राह्मण, न क्षत्रि, न वैश्य और नशूद्र है। वह केवल कर्म से ही किसी वर्ण को प्राप्त कर सकता है। यह भी सच है कि वर्तमान में सनातन धर्म के अनुसार कर्माधारित ब्राह्मण तो धरातल से विलुप्त ही हो गया है। ब्राह्मण होना देवता होने के समान है। किन्तु जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से। जाति व्यवस्था का निर्माण कर्माधारित ही था। लेकिन समाज के दूषित होने के कारण यह जन्माधारित बन गई। कालान्तर में यही जाति प्रथा सनातन धर्म के पतन  एवं भारत की गुलामी का कारण बनी। आज मुम्बई में 50 हजार लोंगो का खुले आम उत्पात मचाने का साहस होने का कारण हमारा जातियों में बँटा होना ही है। 

jlsingh के द्वारा
August 22, 2012

किन्हें संबोधित करूं, असमंजस में हूँ अनुराग जी, नमस्कार ! आपने डॉ. हिमांशु शर्मा की कविता को मंच पर रक्खा है, इस कविता को यहाँ प्रस्तुत करने के पीछे आपकी क्या भावना है …. आपने स्पष्ट नहीं किया. ब्रह्मण आज भी पूज्य हैं बशर्तें कि उनमे ब्रह्मण के गुण हैं. साभार!

    annurag sharma(Administrator) के द्वारा
    August 23, 2012

    पहले तो आपको हिमांशु शर्मा का प्रणाम श्रीमान जी आगोश और जीवन एक महादर्शन मेरे ही ब्लॉग है।आप अनुराग जी को ‘जीवन एक महादर्शन’ मे संबोधित करे आपकी मेहरबानी होगी।


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